Saturday, January 1, 2011

गुड्डू बने किडनैपर, अब जेल में बीतेगी विधायकी

बुलंदशहर जिला बसपा में कोषाध्यक्ष देवेन्द्र भारद्वाज को अनूपशहर सीट पर विधायक गजेन्द्र सिंह के खिलाफ मजबूत करने की रणनीति गुड्डू पंडित के जीवन की सबसे बड़ी गलती बन गई है। अपने कुनबे के साथ 26 बीडीसी सदस्यों के अपहरण कांड में जेल गये एमएलए गुड्डू पंडित पर गैगस्टर एक्ट लगाय़ा गया है। जिला प्रशासन ने अगले कुछ ही दिनों में उन्हें रासुका में निरूद्ध करने के संकेत दिये है, साथ ही गुड्डू पंडित का बसपा से विदा होना भी तय है। 

21 दिसंबर की शाम छतारी के पास बसपा विधायक गुड्डू पंडित, उनके भाईयों और करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगो ने हथियारों की नोंक पर आगरा से जहॉगीराबाद जा रहे एक बस में सवार 26 बीडीसी सदस्यों का अपहरण कर लिया और फरार हो गये। इस वारदात में विधायक गुड्डू पंडित के साथ जिला बसपा के कोषाध्यक्ष देवेन्द्र भारद्वाज, अनूपशहर के पूर्व ब्लाक प्रमुख विनोद राव और डूँगराजाट का ग्राम प्रधान सुन्दर सिंह भी शामिल था। दरअसल, जिला बसपा में अपनी दबंगई के चलते गुड्डू पंडित ने विधायक गजेन्द्रसिंह के विरोध के बाबजूद गाजियाबाद में एआरटीओ अर्जुनसिंह की पत्नी मायादेवी को जहॉगीराबाद से प्रत्याशी बनाया था और पार्टी का समर्थन दिलाने में भी कामयाब रहे। 
      
गुड्डू की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी इस सीट को जीत कर गुड्डू एक तीर से दो शिकार करने की जुगत में थे, एक तो पार्टी में सिक्का बना रहे, दुसरे गजेन्द्रसिंह को उनके ही गढ़ में धूल चटाकर 2012 के चुनावों के लिए अनूपशहर सीट से देवेन्द्र भारद्वाज को प्रत्याशी प्रोजेक्ट किया जाये।
      
लेकिन देर रात तक जिलाधिकारी कार्यालय पर हुए घेराव और कानून-व्यवस्था को चौपट होते देख डीएम ने एसएसपी को मामले की जॉच के निर्देश दिये। आधी रात के बाद गुड्डू की हरकत पुलिस अभिलेखों में दर्ज हुए और राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश के बाद गुड्डू पंडित एंड कंपनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया। 22 दिसंबर को जहॉगीराबाद ब्लाक प्रमुख चुनाव के लिए वोट तो डाले गये, लेकिन मायादेवी के खिलाफ खड़े प्रत्याशी विजेन्द्रसिंह ने मतदान का बहिष्कार कर दिया। 
     
उधर एसएसपी के निर्देशन में जिले भर में पुलिस की टीमों ने गुड्डू पंडित के कई ठिकानों के अलावा देवेन्द्र भारद्वाज और विनोद राव की मॉदें खँगाल डाली। विनोद राव समेत और गुड्डू पंडित के भाई प्रेमशर्मा समेत एक दर्जन लोग पुलिस ने गिरफ्तार किये और नौं गाड़ियों के अलावा भारी मात्रा में असलाह बरामद किये गये। जिले से भागने गुड्डू की कोशिश कर रहे गुड्डू पंडित को जेपी नगर के हसनपुर में उनके गनर समेत पकड़ा गया। बाद में एसएसपी गुड्डू पंडित को बुलंदशहर ले आये।
     
अगले दिन जब गुड्डू पंडित जेल जाने के लिए सज रहे थे, पुलिस ने टीचर्स कॉलोनी में उनके भाई मुकेश पंडित को उनकी ससुराल में दबोचा। गुड्डू गुरूवार को जेल भेजे गये और मुकेश शुक्रवार को। चुनाव आयोग के आदेश पर जहॉगीराबाद का मतदान निरस्त होकर 26 दिसंबर को पुनर्मतदान कराया गया और क्लीन स्वीप करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी विजेन्द्र सिंह ने जीत दर्ज की।
    
छतारी से अगवा किये गये बीडीसी सदस्यों को नरौरा, डिबाई में गुड्डू के ठिकानों के अलावा अनूपशहर में देवेन्द्र भारद्वाज के ठिकानों पर बंधक बनाकर रखा गया था। पुलिस ने 14 बीडीसी सदस्यों को मुक्त कराया। बाकी जगहों पर बंधक बीडीसी पुलिस के डर से भागे गुड्डू के गुर्गों के जाने के बाद निकल आये थे। गुड्डू पंडित एंड कंपनी पर मुकदमा दर्ज होने के बाद बसपा हाईकमान ने विनोद राव और देवेन्द्र भारद्वाज को पार्टी से निकाल दिया है। देवेन्द्र भारद्वाज अभी पुलिस के चंगुल में नही आये है, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद उनकी और मजामत भी होगी, ऐसे संकेत सरकार से मिले है।
    
मायादेवी के पति अर्जुनसिंह भी पुलिस से भाग रहे है। इनकी तलाश में जिला पुलिस की कई टीमों ने नोयडा, गाजियाबाद और दिल्ली में डेरा डाल रखा है। इसके अलावा शनिवार को गुड्डू पंडित, उनके भाई मुकेश, विनोद राव, और सरकारी गनर समेत 10 लोगो के खिलाफ गैंगस्टर लगाया गया है। सरकार से मिली ढ़ील को देखे तो जिला प्रशासन और पुलिस गुड्डू और उनके गुर्गों पर रासुका लगाने का मन बना चुकी है। तय है कि गुड्डू की बाकी विधायकी जेल में ही बीतेगी।

Monday, December 6, 2010

चमत्कार- भूतबाबा लाइव


    कार के डेशबोर्ड पर चैनल का लॉगो लगा माइक रखा था। जिस गॉववाले से पूछते, वह उस माइक को देखता और मुस्कराकर आगे की ओर इशारा कर देता था। एक पक्की सड़क पर हमारा सफर खत्म हो गया। कार से उतरते ही गॉववालों ने घेर लिया। शर्माजी का घर पूछा तो साथ लग लिये..जैसे बाबले गॉव में ऊँट आ गया हो। लेकिन जिस खरंजे पर हम जा रहे थे उस पर पहले से ही सन्नाटा पसरा था। साथ चलते वक्त गॉववाले बता रहे थे कि पढ़ने-लिखने में होशियार एक लड़का कैसे पीर बन गया।
     शर्माजी हमें देखते ही कुछ समझ गये। शायद उन्होने पीपली लाइव देख रखी थी। वो जिस खाट पर बैठे थे, उनके पास ही एक मटमैले रंग की लोही लपेटे बैठे उस नौजवान की उमर बीस एक साल रही होगी। मिट्टी लगी शर्ट के साथ शर्माजी ने तहमद लपेट ऱखा था। दोनो किरदार दिलचस्प थे। हमने हालचाल जाना और लगे हाथ दर्द टटोलने शुरू कर दिये।
    लड़का ऐसे चुप था जैसे उसने ना बोलने की कसम खाई हो। ना चेहरे पर कोई भाव और ना ही ऑखों में कोई सपने। शर्माजी एक बार बोलना शुरू हुए तो रफ्तार ही पकड़ ली। 2 अक्टूबर को प्रदीप ने शरीर ढीला छोड़ दिया। झोलाछाप फेल हुए तो अलीगढ़ पहुँचे, लेकिन यहॉ के डॉक्टर लड़के की छाती पर आला रखने को भी राजी नही थे। शर्माजी के साले साहब दिल्ली सीबीआई में मुलाजिम है। मदद की दरकार लिये उनकी चौखट पर जा पहुँचे। उनके घर के बाहर दूसरे किनारे पर एक पीर की मजार है। गाड़ी रोककर दरवाजा खटखटाया, लेकिन तभी कार नाले में चली गई। बड़े लड़के ने निकालने की कोशिश की, 12-15 लोगो ने सहारा लगाया। लेकिन कार तो हिली ही नही। अचानक कई घंटों से मरणासन्न हालत में पड़े प्रदीप ने ड्राइविंग सीट सँभाली और कहा मैं निकालूगा। अगले ही पल गाड़ी स्टार्ट और बैक गियर लगाते ही कार नाले के बाहर। शर्माजी समझ गये कि चक्कर ऊपरी है।
     साले साहब की सिफारिश पर एक अस्पताल में दो दिनों तक प्रदीप को बोतलें चढ़ती रही। डॉक्टर बोला- घर ले जाओ लौंडा एकदम ठीक है। फिर घर ले आये। लेकिन घर आते ही प्रदीप की फिर वही हालत। लेकिन अब उसका शरीर इठने लगा था। घर के सभी लोग मौजूद थे, तभी प्रदीप की आवाज भर्रायी। वह बोला मैं ले जाऊँगा इसे। बचा सको तो चैलेंज है। अचानक आवाज बदल गई। शरीर में फिर से ऐंठन हुई और अब प्रदीप पैर मोड़कर बैठ गया और आसमान की ओर देखकर दोनों हाथों से दुआ करने लगा। थोड़ी देर में उसने फिर से बोलना शुरू किया। प्रदीप की मॉ को बुलाया और बोला- ‘मॉग ले दुनियां की कोई भी चीज, आज खाली हाथ नही रहेगी। रूपया-पैसा जो भी चाहे। लेकिन तेरा लड़का नही बचेगा। इसे तो जाना है’ मॉ गिड़गिड़ाने लगी। बोली- ‘बाबा मुझे तो लड़का ही चाहिए और कुछ नही। बाबा बोल उठा, बहुत मुश्किल है, कोशिश करूँगा। कल सुबह तक मेरी मजार तैयार कराओ। अगले दिन मजार तैयार हो गई। बाबा फिर आये शाम को, बोले- कल सुबह साढ़े नौ बजे वो शैतान ले जायेगा तेरे बेटे को। मैं हामी तो नही भरता, लेकिन बचाने की कोशिश करूँगा। तीन दिन तक इसके शरीर को मेरी मजार पर रखे रहना और मेरा इंतजार करना।
     वही हुआ जो बाबा ने कहा था। अगले दिन साढ़े नौ बजे प्रदीप की सांसे थम गई। हमने घर से ले जाकर उसके शरीर को मजार पर रख दिया और उसके ऊपर एक चादर ढक दी। घर में रोवा-पिट्टान पड़े थे। लेकिन हमें उम्मीद थी कि बाबा वादा पूरा करेगे। हजारों के झुक्कान झुके गये। सबकी ऑखें प्रदीप की तरफ देख रही थी। दोपहर बाद ढाई बजे के आसपास अचानक प्रदीप के चेहरे से चादर हट गई और उसके शरीर में हरकत होने लगी। देखते ही देखते वह उठ बैठा और मजार के नीचे बिस्तर लगाने का आदेश दिया। बिस्तर लगा तो प्रदीप ने टोपी मॉगी। भीड़ में मौजूद मौलवी साहब ने अपनी टोपी दे दी। उसके बाद चाकू माँगा और अपने कपड़े फाड़कर उतार दिये। हाथ में चाकू आते ही बाबा ने प्रदीप के शरीर को करीब सौ जगहों से गोद डाला। और वहॉ निकले खून को शरीर पर मल लिया। मुझसे बोले- तेरा लड़का बचा लिया है। अब मेरी सेवा करना। हर वृहस्पतिवार को गद्दी लगेगी। सो अब हर वृहस्पतिवार को गद्दी लगती है औऱ बाबा सबकी फरियाद सुनते है।
    शर्माजी का बेटा प्रदीप अलीगढ़ के एक मेडीकल कॉलेज में बी-फार्मा की छात्र था। मैं हैरत में पड़ गया कि खांटी ब्राह्मण परिवार का मेडीकल स्टूडेंड लड़का फकीर कैसे बन सकता है और वह भी गैर मजहब का। लेकिन मेरे दिमाग में स्टोरी चल रही थी। इस कहानी को टीवी के लिए कैसे जाग्रत किया जाये। कैमरे खुल गये। बाबा की मजार की शूट शुरू हो गई। गॉववालों से हम बात करने लगे। प्रदीप भी मजार के एक तरफ मेंड़ पर आकर बैठ गया। अचानक मेरे साथी मुकुलजी को खुराफात सूझी। गॉववालों से बोले- हम बाबा का प्रचार करने आये है। हम स्टोरी टीवी पर चलाऐगें और फिर यहॉ डॉक्टर और रूह विज्ञान के विशेषज्ञ आकर बाबा पर रिसर्च करेगें। थोड़ी देर बाद मुकुलजी ने प्रदीप को ऑखों से इशारा किया कि मजार पर आकर एक शॉट दे दें। प्रदीप ने लोही उतारी और मजार पर आ गया। उसने दुआ को पोज बनाते हुए हमें शॉट देना शुरू किया। बामुश्किल 10 सैंकेड गुजरे होगे कि वह ऐंठने लगा। गॉववाले चीखने लगे—बाबा आ गये। अब सब पूछ लेना।
    मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारों में मेरा अक्सर आना जाना रहता है। लेकिन मुझे कभी डर नही लगा। बाबा आ गये सुनते ही मेरे रौंगटे खड़े होने लगे। मुझे लगा कि अब बिना तैयारी के चमत्कार देखना होगा। मुझे मुकुलजी अब विलेन लग रहे थे। पता नही, क्या जरूरत थी बाबा को बुलाने की। इतना सोचते मैंने मजार की चाहरदीवारी छोड़ दी, लेकिन कैमरा ऑन रहा। शर्माजी हाथ में बिस्तर,गद्दी,चाकू और टोपी लेकर आ गये। दो लड़कों ने अगरबत्ती सुलगाकर उसका धुँआ बाबा के चारों ओर घुमाना शुरू किया। डर के मारे मेरा मन कर रहा था कि कैमरा बंद कर लूँ, कही बाबा नाराज हो गये तो...। लेकिन कैमरा चालू रहा। मुकुलजी तो बाबा के सामने जाकर ऐसे शूट कर रहे थे जैसे अब उनका चैनल बाबा को आठ दिन तक लगातार लाइव दिखाने वाला है। उनके चेहरे पर वहॉ बदले माहौल को लेकर किसी भी तरह का कोई रिएक्शन भी नही था। गद्दी पर विराजमान बाबा ने  टोपी पहनी और जोर से बोले- बता क्यों बुलाया है मुझे, अल्लाह की बगैर मर्जी से आया हूँ। गिड़गिड़ाने के अंदाज में शर्माजी ने कुहनियों तक हाथ जोड़कर कहा- बाबा मीडियावाले आये है। बेटा के बारे में पूँछ रहे थे। ‘क्या पूँछ रहे थे बताओ, क्या कैमरे में कैद करना चाहते हो। लगता है मुझ पर शक कर रहे हो। लो करो कैद मुझे कैमरे में। अब दिखाऊँगा तुम्हे अल्लाह के निशान। इतना कहते है बाबा ने अपनी शर्ट को दोनो हाथों से खींचा। मेरी डर के मारे घिग्गी बँध गई, मैने सोचा किसी तरह मुसीबत में से निकलूँ, कहा- बाबा..हम आपको कैमरे में कैद नही करना चाहते, बस आपके दर्शन करने थे, सो कर लिये अब आप शांत हो जाओ। कहते ही मैंने कैमरा ऑफ कर लिया। मुझे उम्मीद थी कि मुकुलजी भी य़ही कहेगे, लेकिन उनका कैमरा चलता रहा और वह चुप रहे। बाबा ने बनियान भी उतार दी और हाथ फैलाकर बोले, चाकू लाओ। हाथ में चाकू आते ही बाबा ने बाजुओ और सीने पर ऐसे काटना शुरू किया जैसे मौसमी के छिलके उतारते वक्त कट लगाये जाते है। मुझे लगा कि बाबा मजाक के मूड में है, लेकिन कुछ सैकेंड बीतने पर बाबा ने जहॉ-जहॉ मार्क किये थे, वहॉ खून निकलना शुरू हो गया। बाबा बोले- और दिखाऊँ। शर्माजी ने हाथ जोड़कर कहा, बाबा मान जाओ, अब रहने दो।
    अब बाबा ने फरियादें सुननी शुरू की। एक नौजवान आगे पहुँचा और नौकरी के लिए फरियाद करने लगा। बाबा ने उसे एक साल का वक्त देकर कहा कि गद्दी पर आते रहना। फिर चीखकर बोले- हैं और कोई कुछ पूँछना चाहता है। मैंने देखा मुकुलजी कैमरा एक गॉववाले को पकड़ाकर बाबा के सामने पहुँच गये और हाथ दिखाते हुए बोले- बाबा मैं बहुत परेशान हूँ। बाबा बोले- तुझे कोई परेशानी नही। नही बाबा मेरे जीवन में बहुत दुख है। मुकुलजी ने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना बाबा को कह सुनाया। बाबा आसमान टापने लगे। फिर बोले- गद्दी पर आना।
   मुकुलजी उठ आये और फिर से कैमरा चलाना शुरू कर दिया। बाबा चले गये और प्रदीप के जिस्म में ऐंठन शुरू हो गई। थोड़ी देर में प्रदीप बेहोश था और उसके परिजन उसे घर की ओर ले जा रहे थे। मैंने मुकुलजी से कहा-चलो जल्दी निकलो। कहॉ फांस दिया। कान में बोले- बड़ी स्टोरी है टीआरपी जमकर मिलेगी। शर्माजी से गद्दी पर आने का वादा करके मुकुलजी कार में बैठे तो मैंने झींकना शुरू कर दिया- क्या जरूरत थी मजार पर पोज बनबाने की, गद्दी वाले दिन कर लेते। मुकुलजी बोले- बाबा डॉक्टरों के आने की बात सुनकर डर गया। लेकिन यार उसकी नौटंकी के आगे हमारी स्टोरी कुछ भी नही। इसकी पीपली लाइव असली है, लेकिन बाबा फ्रॉड है। मेरे दिमाग में सवालों के अंबार लग गये। सोचने पर मुझे भी लगा...चमत्कार कहॉ है, बस एक डर था और ऐसे डर देहातियों तो फांसने के लिए काफी होते है।

Thursday, November 18, 2010

खतरा....जलपरी को बचाओ


    शिशु के लिए सबसे महफूज जगह उसकी मॉ का ऑचल होता है, लेकिन गंगा मैया की जलपरी के लिए गंगा की धारा कब्रगाह बन गई है। बुलंदशहर में दुर्लभ डाल्फिन के लिए प्रख्यात रामसर साइट शिकारियों के चंगुल में है, नतीजा बेरहम शिकार बेजुबान डाल्फिन को एक-एक कर निशाना बना रहे है। डाल्फिन की ये दुर्गति उस वक्त है जब डाल्फिन के संरक्षण के लिए विश्व प्रकृति निधि को सरकारें दोनो हाथों से खजाना लुटा रही है। डाल्फिन बची रहे इसलिए उसे राष्ट्रीय जलीय जीव भी घोषित किया जा चुका है।
     बुलंदशहर, रामघाट इलाके में निबाड़ी खादर में पिछले दो दिनों से जलपरी की लाशें होने की जानकारी मिल रही थी। आज सुबह वहॉ जाने पर काफी तलाश के बाद एक जलपरी की लाश नजर आई। मौत का सही-सही कारण तो नही बताया जा सकता, लेकिन डाल्फिन की मौत के बाद उसकी पहचान मिटाने के लिए हत्यारे ने काफी मशक्कत की, ऐसा देखकर लगा। शिकारियों के हाथ लगी डाल्फिन की पहचान ना हो सके इसलिए शिकारियों ने उसके मुँह के दोनो जबड़े अलग करने की कोशिश की और काफी बेदर्दी से उसे गले तक फाड़ दिया।
    निबाड़ी खादर पर मिले ग्याप्रसाद ने बताया कि बुधबार को डाल्फिन सर्वे के लिए कानपुर को निकली विश्व प्रकृति निधि की टीम ने निबाड़ी खादर के पास बह रही एक सूँस (डाल्फिन का देहाती नाम) को अपनी नाव से बॉध लिया और उसके फोटो भी खींचे। बाद में उस डाल्फिन का कोई पता नही चला। ग्रामीण का अनुमान है कि डब्लूडब्लूएफ की टीम ने मरी हुई सूँस को आगे ले जाकर कहीं डिस्पोज कर दिया।
      दरअसल, जब से बुलंदशहर से गुजर रही गंगा की धारा में डाल्फिन के संरक्षण के कार्यक्रम शुरू हुए है, जिला प्रशासन, पुलिस और वन विभाग की मुश्किलें काफी बढ़ गई है। सरकार चाहती है कि गंगा  में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जलपरी का कुनबा बढ़ाया जाये। और इसीलिए विश्व प्रकृति निधि (भारत) को इसका जिम्मा सौंपा गया है। विश्व प्रकृति निधि ने गंगा के किनारे बसे इलाकों में डाल्फिन बचाने के लिए काफी जागरूकता कार्यक्रम चलाये है, लेकिन गंगा किनारे शिकारियों के कब्जे डब्लूडब्लूएफ आज तक नही हटा पाई। गढ़मुक्तेश्वर से नरौरा तक के गंगा इलाके को रामसर साइट घोषित किया गया और कानून के मुताबिक यहॉ शिकार पर रोक है। लेकिन आप कभी डाल्फिन दर्शन के बहाने इस इलाके में आइये..शिकारियों के गिरोह दिन-रात सक्रिय पायेंगे।
     पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता का ही असर है कि डाल्फिन की तादात जिस तेजी से बढ़नी चाहिए थी, वो प्रगति देखने को नही मिली। लेकिन डाल्फिन बढ़ी हो या नही, डब्लूडब्लूएफ के फंड का जुगाड़ काफी बढ़ा है। निधि यहॉ देश-विदेश के सेलेब्रिट्रीज को ‘डाल्फिन बाच’ के बहाने लाती है और फायदा उठाती है। रामसर साइट में शिकार प्रभावी होने से उसे भी काफी मुसीबतें उठानी पड़ सकती है। उसके लिए खुले सरकारी खजाने मुँह पर ताला पड़ सकता है।
     बात डाल्फिन की तादात की करें तो बाढ़ खत्म हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गया, लेकिन विश्व प्रकृति निधि के आंकड़ो में जलपरियों की संख्या स्थिर नही हो पा रही। गॉव वाले बताते है कि उन्होने बाढ़ के बाद डाल्फिन को गंगा से निकलने वाली नहरों और रजवाहों में देखा है। कुछ डाल्फिन तो डाउन स्ट्रीम में उतर गई जिनका रामसर साइट में लौटना असंभव है। जो बची-खुची है उनको शिकारियों की ऑखें नही छोड़ रही। विश्व प्रकृति निधि की ओर से नरौरा में केवल दो कर्मचारी रहते है और इन दोनो के जिम्मे ही डाल्फिन की सुरक्षा और उसके कुनबे को बढ़ाने की जिम्मेवारी है। निधि के अफसर तीज-त्यौहार में आने वाले मेहमानों की तरह आते है। सक्रियता की बात करें तो जिस डाल्फिन की लाश निबाडी खादर में दो दिन से पड़ी थी, गुरूवार को सूरज डूबने तक डब्लूडब्लूएफ उसे नही ढूँढ़ पाया। वनविभाग और पुलिस का भी हाल कुछ जुदा नही है। प्रशासनिक महकमों को डाल्फिन को बचाने की मुहिम में मछुआरों की मदद करिश्मा कर सकती है, लेकिन पीठ पीछे डब्लूडब्लूएफ के अफसर किसी भी ऊँच-नीच में उन्हें ही फँसाने के जुगाड़ करते रहते है। इसी वजह से हर कोई इस पचड़े से पल्ला झाड़ता नजर आता है।
     डाल्फिन का स्वभाव बहुत हद तक इंसानों जैसा होता है। इसकी खूबसूरती और गंगा की धारा में इसकी तेजी देखने लायक होती है। शायद यही वजह है कि बुलंदशहर गंगा किनारे आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इसकी अठखेलियों का मोह नही छोड़ पाते। प्रदूषण से अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझती गंगा में डाल्फिन के अलावा अब शायद ही कुछ ऐसा हो, जिसे कोई देखना चाहे। डाल्फिन का संरक्षण इतना मुश्किल भी नही, बस जरूरत है विश्वास की जिसे सरकारें अवाम के दिलों में जगा सकें।

Sunday, October 24, 2010

कप्तान साहब के खाते पर खतरा

(शाहजहॉ का फाइल फोटो)
(अपने बच्चों के साथ अलीशेर)
  
कानून की रक्षा के लिए खाकी वरदी वाले बने है, और इंसाफ के लिए खुली हुई है अदालतें। लेकिन ये कड़वा सच है कि आम आदमी से लेकर खास तक, सभी खाकी के पहरूयों के डंडे के खौफ में जीते है और शायद इसीलिए खाकी वरदीवाले ना तो अदालतों की परवाह करते है और ना अदालत के फरमान की। बुलंदशहर में एडीजे तृतीय अदालत का एक फैसला पिछले ढाई सालों से वरदीवालों के ऑफिसों की धूल चाट रहा है। मगर इस बार इंसाफ का पलड़ा भारी है। अदालत ने पुलिस कप्तान के खाते कुर्क करके एक मुआवजे की रकम वसूलने के आदेश दे दिये है।
    कोतवाली बुलंदशहर देहात के कुच्छेजा गॉव में बढ़ईगीरी से परिवार पालने वाले अलीशेर (करीब 45 साल) का परिवार रहता है। 13 अप्रैल 2006 की सुबह अलीशेर की पत्नी शाहजहॉ (करीब 40 साल) गॉव के बाहर सड़क के किनारे सड़क पार करने के लिए खड़ी थी। बुलंदशहर की ओर से आ रहे कैदियों से लदे पुलिस के बेकाबू ट्रक ने शाहजहॉ को रौद डाला। हादसे के बाद तड़फती शाहजहॉ को देखकर जब वहॉ से गुजर रहे एक राहगीर ने चीख-पुकार की तो पुलिसवालों ने ट्रक रोककर शाहजहॉ और उस राहगीर को ट्रक में डाल लिया और अनूपशहर की ओर भागने लगे। कैदियों ने ट्रक में हंगामा कर दिया तो पुलिसवाले कुछ दूर चलकर वापस मौका-ए-वारदात पर आये और शाहजहॉ और उस राहगीर को फैंककर भाग गये। पुलिसवालों की संवेदनहीनता के कारण शाहजहॉ की सांसे इस दुनियां से हमेशा के लिए विदा हो गयी।
विरोध-प्रदर्शन और हंगामे के बाद पुलिसवालों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। अलीशेर ने एडीजे तृतीय की अदालत में एसएसपी बुलंदशहर, प्रतिसार निरीक्षक और पुलिस ट्रक के ड्राइवर के खिलाफ मुआवजे की मॉग को लेकर मामला दायर किया। माननीय अदालत ने 5 मार्च 2008 को फैसला देते हुए हादसे की तारीख से 6 प्रतिशत ब्याज समेत 1 लाख 79 हजार पॉच सौ रूपये बतौर मुआवजा पीड़ित परिवार को देने के आदेश दिये। लेकिन पुलिस विभाग ने इस आदेश को रद्दी की टोकरी में डालकर अपनी ऑखें बंद कर ली।
    शाहजहॉ की मौत के बाद अलीशेर का परिवार बिखर गया। शाहजहॉ के पास गोद के दो बच्चे थे। उनकी परवरिश की जिम्मेवारी गरीब अलीशेर पर थी। बच्चों की जिम्मेवारी में वह अपनी मजदूरी से भी हाथ धो बैठा। लेकिन इन हालात के लिए जिम्मेवार पुलिस विभाग के अफसरों ने उसकी मजबूरियों की परवाह नही की। अदालत ने प्रतिवादियों की हठधर्मिता देखते हुए पुलिस के अफसरों से मुआवजे की रकम की वसूली के आदेश जिला प्रशासन को दिये। जिला प्रशासन ने 25 सितंबर 2010 को प्रतिवादियों को अंतिम चेतावनी (साइटेशन) जारी की, लेकिन कोई असर नही हुआ। जिला प्रशासन ने 14 अक्टूबर को प्रतिवादियों की सम्पत्ति (विभागीय खातों) की कुर्की के लिए नोटिस जारी किया है। पुलिस कप्तान के पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए जिला प्रशासन ने 21 अक्टूबर को एक और पत्र जारी करते हुए उन्हें अदालत द्वारा नियत 27 अक्टूबर 2010 तक मुआवजे के रकम अदा करने का अनुरोध किया है। बुलंदशहर के पुलिस कप्तान अमिताभ यश का कहना है कि अदालत द्वारा नियत रकम का भुगतान शासन को करना है। इस आशय का पत्र लखनऊ भेजा जा चुका है।
    सवाल पुलिस और शासन के पत्रों का नही, अदालत के आदेश का है..उस गरीब की मदद के सरोकार का है जो पिछले साढ़े चार सालों से अदालत का मुँह देख रहा है। पुलिसवालों की लापरवाही ने अलीशेर का परिवार तबाह करने में कोई कसर नही छोड़ी है। पहले उसका परिवार उजाड़ा और फिर मुआवजे की रकम के आदेश की बार-बार अनदेखी की है। अलीशेर की ऑखें अब जिला प्रशासन की ओर लगी है। रामजाने पुलिसवालों के खातों पर ताला पड़ेगा या नौकरशाह फिर से अपने रिश्तों की डोर मजबूत करेगे।

Wednesday, April 14, 2010

शहादत की खैरात पर अब लगेगा ताला


देश के लिए कुर्बानी का मतलब किसी भी वरदान से बहुत बड़ा होता है। ये बिडम्बना ही है कि इस देश में शहादत के बाद शहीदों के परिवारों को सम्मान और मदद के लिए सरकार के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहना पड़ता है। लेकिन ना तो सरकार और ना ही समाज, कोई भी शहीदों के आश्रितों की मदद के लिए आगे नही आता। ये कहानी देशसेवा में अपने प्राणों का बलिदान देने वाली पायलट शेफाली चौधरी की है। शेफाली की शहादत के बाद उसकी मॉ को सरकार से पैंशन के नाम पर पन्द्रह सौ रूपये महीने की खैरात मिलती है। लेकिन इस साल शेफाली की नौकरी का कमीशन्ड पीरियड खत्म होते ही इस खैरात पर ताला लग जायेगा। बुलंदशहर की शेफाली चौधरी हिन्दुस्तान की पहली एअरकाप्टर महिला पायलट थी।
       
उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुकी 67 साल सुशीला चौधरी की जिंदगी अब चंद यादों के सहारे ही बाकी है। बुलंदशहर की सुशीला चौधरी ऐसी वीर बेटी की मॉ है, जिसने महज 22 साल की छोटी सी उम्र में बड़ी शहादत देकर इस मॉ की कोख को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कर दिया। शेफाली चौधरी इंडियन एअरफोर्स की पहली एअरकाप्टर महिला पायलट थी। 24 मार्च 1996 को असोम में तैनाती के वक्त शेफाली ने नदी में डूबते 2 लोगों की जान बचाई लेकिन खुद सेवा की बेदी पर कुर्बान हो गई। शेफाली नही रही। पिछले 13 सालों से भारत सरकार उनकी मॉ को शेफाली की शहादत की पैंशन के नाम पर पन्द्रह सौ रूपये महीने की खैरात देती है। लेकिन इस साल शेफाली की नौकरी का 14 साल का कमीशन पीरियड खत्म होते ही सरकारी खैरात का एकाउन्ट हमेशा के लिए बंद हो जायेगा। 
     सुशीलाचौधरी कहती है कि देश के लिए जान देने वालों के प्रति सरकार अगर ऐसा बेरूखा रवैया रखेगी तो भला कौन नौजवान देश के लिए सोचेगा। यहॉ सुप्रीम कोर्ट की पिछले दिनों आई वह टिप्पणी को नजीर कहा जा सकता है जिसमें अदालत ने सरकार से ऐसे सैनिकों और उनके आश्रितों के प्रति अच्छा व्यवहार करने की सलाह दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार सैनिकों को भिखारी ना समझे। हॉलाकि शहादत के बाद शेफाली को सरकार ने सर्वोच्च जीवन रक्षा पदक से सम्मानित तो किया, लेकिन शेफाली की कुर्बानी को भारत सरकार शहादत नही मानती। सरकार मानती है कि शेफाली सेवा में तैनाती पर तो थी लेकिन जिस वीरता में उसकी जान गई वह सरकार का कोई अभियान नही था।
      
शेफाली की शहादत पर केन्द्र सरकार से ज्यादा बेरूखी बुलंदशहर जिला प्रशासन ने की है। 2001 में जिला योजना से 2 लाख रूपये जारी कर जिला प्रशासन ने शेफाली की याद में उसके पैतृक गॉव लौदाना में एक स्मृतिद्वार बनाने का काम शुरू किया। लेकिन काम अधूरा छोड़कर सुलभ इंटरनेशनल नाम का कार्यदायी एनजीओ पूरा पैसा डकार गया। काम ठप्प होने के बाद शेफाली के माता-पिता ने जिला प्रशासन के अफसरों की चौखट पर सैकड़ों बार चक्कर काटे लेकिन अफसर काम पूरा कराना तो दूर, उस संस्था का पता तक नही खोज पाये। शेफाली की यादें जिन्दा रहने के लिए आज भी सरकार की हमदर्दी की मुन्तजिर है। शेफाली के पिता की मौत के बाद जिलाधिकारी की चौखट पर सैकड़ों बार इस बूढ़ी मॉ ने अरजी लगाई, तब से एक दर्जन से ज्यादा जिलाधिकारी बदल गये लेकिन किसी भी अफसर की सोच में तब्दीली नही आई। सुशीला चौधरी बताती है कि समझदार होने के बाद उन्होने कभी शेफाली को रोते हुए या दुखी नही देखा। मॉ की ये यादें उस वीर बेटी के साहस को सलाम है जिसके चलते शेफाली गॉव की ऊबड़-खाबड़ कच्ची गलियों से आसमान की बुलंदियां तक का सफर तय कर पाई। उसने उस जज्बे को भी सच किया जिसकी शपथ उसने अपनी एअरफोर्स ज्वाइन करते वक्त ली थी। सेवा और देशभक्ति का जज्बा...। अब सरकार भले ही शेफाली की शहादत को इत्तेफाकन मौत माने, लेकिन ये सवाल हमेशा दिल को कचोटता है कि देश के लिए मर मिटने वालों के साथ सरकार की ऐसी बेरूखी के चलते भला कौन-मॉ अपनी बेटी को शेफाली बनाना चाहेगी।

Thursday, April 1, 2010

तालीम के परवाज- बुलंदशहर का सुपर-थर्टी


  देश में आज से समान शिक्षा अधिकार काकानून लागू हो गया है। कपिल सिब्बल के इस भागीरथी प्रयास को अभी जमीन पर उतरने में वक्त लगेगा, लेकिन बुलंदशहर के एक सैनिक ने अपने ही ढंग से ज्ञान की अलखजगाई है। केन्द्र सरकार में मुलाजिम ये सैनिक पिछले एक साल से खुले आसमान के नीचे देश-सेवा के लिए प्रतिभाऐं तराश रहा है।
  बुलंदशहर में शाम ढले जब सूरज जमीन पर उतरता है, तो जौंठ गॉव के एक कोने में तालीम के पंख परवाज भरते है।खुले आसमान के नीचे पैबंद लगे टाट के तले इस गॉव में एक कक्षा चलती है औऱ इस गुरूकुल में तराशे जाते है देश की खातिर कुर्बान होने वाले सिपाही। बिहार के सुपर-थर्टी की तरह चलने वाली इस क्लास में जॉबाजी के जज्बे के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है, और वो भी एकदम फ्री। केन्द्र सरकार में मुलाजिम चिंतामणि कपासिया ने साल भर पहले इस क्लास का सपना देखा था। आज इस कक्षा में तैयारी करने वाले कई लड़के नौकरी पा चुके है और कई लाइन में है।
  चिंतामणि कपासिया कहते है कि मौका मिलने पर जब वह गॉव आते थे, तो उन्होने गॉव के लड़कों को नशे और झगड़ों की गिरफ्त में देखकर बहुत दुख होता था। चिंतामणि कपासिया दिल्ली में 12 साल से सरकारी सेवा में है। लेकिन उनके बाद तीन हजार की आबादी वाले इस गॉव के किसी लड़के को सरकारी नौकरी नही मिली। नौजवानों को दिशा देने के लिए उन्होने कुछ करने की ठानी। उन्होने गॉव के लड़को को सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने का खाका तैयार किया। उन्होने एक यूथ क्लब बनाया और ग्राम सभा की अनुमति से टाट की छॉव में क्लास शुरू कर दी। सेटरडे और संडे के वीकली ऑफ में चिंतामणि दिल्ली से गॉव आते है और दो दिन उनकी क्लास चलती है। दो महीने पहले जब उनकी क्लास के एक लड़के रिंकू का सीआरपीएफ में सलेक्शन हो गया तो आसपास के गॉवों में भी इस अनोखी कक्षा की चर्चाऐं शुरू हुई। आज चिंतामणि की क्लास में जौंठ के अलावा आसपास के गॉवों के 28 लड़के है। चिंतामणि के क्लास के छात्र सतीश बताते है कि उन्हें नही पता था कि परीक्षाओं की तैयारी के लिए क्या करना होता है, लेकिन भाईजी ( चिंतामणि) ने उनकी तकदीर बदल दी।
  चिंतामणि की इस कक्षा में यूपी और दिल्ली पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्सेज, रेलवे और बैंकिग की परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। फिजीकल टेस्ट में पार उतरने के लिए भी छात्रों को तैयार किया जाता है, जिसकी ट्रैनिंग चिंतामणि केभाई त्रिदीव कपासिया कराते है। चिंतामणि की इस कोशिश ने गॉवों के नौजवानों के जीवन की दशा बदल दी है। छोटी-सी नौकरी की कमाई में चितामणि ना तो इस कक्षा के लिए छत जुटा सके है और ना ही कुर्सियां। इन सुविधाओं की ख्बाहिश इस कक्षा के छात्रों को भी नही है। चिंतामणि के साथ इन नौजवानों को आपकी हौसलाअफजाई और दुआ की जरूरत है। ईश्वर करे हमारे देश के हरेक गॉव की चिन्ता करने के लिए ऐसे सैकड़ो चिंतामणि पैदा हो और देश में शिक्षा की तस्वीर बदल दें।