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| (शाहजहॉ का फाइल फोटो) |
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| (अपने बच्चों के साथ अलीशेर) |
कानून की रक्षा के लिए खाकी वरदी वाले बने है, और इंसाफ के लिए खुली हुई है अदालतें। लेकिन ये कड़वा सच है कि आम आदमी से लेकर खास तक, सभी खाकी के पहरूयों के डंडे के खौफ में जीते है और शायद इसीलिए खाकी वरदीवाले ना तो अदालतों की परवाह करते है और ना अदालत के फरमान की। बुलंदशहर में एडीजे तृतीय अदालत का एक फैसला पिछले ढाई सालों से वरदीवालों के ऑफिसों की धूल चाट रहा है। मगर इस बार इंसाफ का पलड़ा भारी है। अदालत ने पुलिस कप्तान के खाते कुर्क करके एक मुआवजे की रकम वसूलने के आदेश दे दिये है।
कोतवाली बुलंदशहर देहात के कुच्छेजा गॉव में बढ़ईगीरी से परिवार पालने वाले अलीशेर (करीब 45 साल) का परिवार रहता है। 13 अप्रैल 2006 की सुबह अलीशेर की पत्नी शाहजहॉ (करीब 40 साल) गॉव के बाहर सड़क के किनारे सड़क पार करने के लिए खड़ी थी। बुलंदशहर की ओर से आ रहे कैदियों से लदे पुलिस के बेकाबू ट्रक ने शाहजहॉ को रौद डाला। हादसे के बाद तड़फती शाहजहॉ को देखकर जब वहॉ से गुजर रहे एक राहगीर ने चीख-पुकार की तो पुलिसवालों ने ट्रक रोककर शाहजहॉ और उस राहगीर को ट्रक में डाल लिया और अनूपशहर की ओर भागने लगे। कैदियों ने ट्रक में हंगामा कर दिया तो पुलिसवाले कुछ दूर चलकर वापस मौका-ए-वारदात पर आये और शाहजहॉ और उस राहगीर को फैंककर भाग गये। पुलिसवालों की संवेदनहीनता के कारण शाहजहॉ की सांसे इस दुनियां से हमेशा के लिए विदा हो गयी।
विरोध-प्रदर्शन और हंगामे के बाद पुलिसवालों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। अलीशेर ने एडीजे तृतीय की अदालत में एसएसपी बुलंदशहर, प्रतिसार निरीक्षक और पुलिस ट्रक के ड्राइवर के खिलाफ मुआवजे की मॉग को लेकर मामला दायर किया। माननीय अदालत ने 5 मार्च 2008 को फैसला देते हुए हादसे की तारीख से 6 प्रतिशत ब्याज समेत 1 लाख 79 हजार पॉच सौ रूपये बतौर मुआवजा पीड़ित परिवार को देने के आदेश दिये। लेकिन पुलिस विभाग ने इस आदेश को रद्दी की टोकरी में डालकर अपनी ऑखें बंद कर ली।
शाहजहॉ की मौत के बाद अलीशेर का परिवार बिखर गया। शाहजहॉ के पास गोद के दो बच्चे थे। उनकी परवरिश की जिम्मेवारी गरीब अलीशेर पर थी। बच्चों की जिम्मेवारी में वह अपनी मजदूरी से भी हाथ धो बैठा। लेकिन इन हालात के लिए जिम्मेवार पुलिस विभाग के अफसरों ने उसकी मजबूरियों की परवाह नही की। अदालत ने प्रतिवादियों की हठधर्मिता देखते हुए पुलिस के अफसरों से मुआवजे की रकम की वसूली के आदेश जिला प्रशासन को दिये। जिला प्रशासन ने 25 सितंबर 2010 को प्रतिवादियों को अंतिम चेतावनी (साइटेशन) जारी की, लेकिन कोई असर नही हुआ। जिला प्रशासन ने 14 अक्टूबर को प्रतिवादियों की सम्पत्ति (विभागीय खातों) की कुर्की के लिए नोटिस जारी किया है। पुलिस कप्तान के पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए जिला प्रशासन ने 21 अक्टूबर को एक और पत्र जारी करते हुए उन्हें अदालत द्वारा नियत 27 अक्टूबर 2010 तक मुआवजे के रकम अदा करने का अनुरोध किया है। बुलंदशहर के पुलिस कप्तान अमिताभ यश का कहना है कि अदालत द्वारा नियत रकम का भुगतान शासन को करना है। इस आशय का पत्र लखनऊ भेजा जा चुका है।
सवाल पुलिस और शासन के पत्रों का नही, अदालत के आदेश का है..उस गरीब की मदद के सरोकार का है जो पिछले साढ़े चार सालों से अदालत का मुँह देख रहा है। पुलिसवालों की लापरवाही ने अलीशेर का परिवार तबाह करने में कोई कसर नही छोड़ी है। पहले उसका परिवार उजाड़ा और फिर मुआवजे की रकम के आदेश की बार-बार अनदेखी की है। अलीशेर की ऑखें अब जिला प्रशासन की ओर लगी है। रामजाने पुलिसवालों के खातों पर ताला पड़ेगा या नौकरशाह फिर से अपने रिश्तों की डोर मजबूत करेगे।

