शिशु के लिए सबसे महफूज जगह उसकी मॉ का ऑचल होता है, लेकिन गंगा मैया की जलपरी के लिए गंगा की धारा कब्रगाह बन गई है। बुलंदशहर में दुर्लभ डाल्फिन के लिए प्रख्यात रामसर साइट शिकारियों के चंगुल में है, नतीजा बेरहम शिकार बेजुबान डाल्फिन को एक-एक कर निशाना बना रहे है। डाल्फिन की ये दुर्गति उस वक्त है जब डाल्फिन के संरक्षण के लिए विश्व प्रकृति निधि को सरकारें दोनो हाथों से खजाना लुटा रही है। डाल्फिन बची रहे इसलिए उसे राष्ट्रीय जलीय जीव भी घोषित किया जा चुका है। बुलंदशहर, रामघाट इलाके में निबाड़ी खादर में पिछले दो दिनों से जलपरी की लाशें होने की जानकारी मिल रही थी। आज सुबह वहॉ जाने पर काफी तलाश के बाद एक जलपरी की लाश नजर आई। मौत का सही-सही कारण तो नही बताया जा सकता, लेकिन डाल्फिन की मौत के बाद उसकी पहचान मिटाने के लिए हत्यारे ने काफी मशक्कत की, ऐसा देखकर लगा। शिकारियों के हाथ लगी डाल्फिन की पहचान ना हो सके इसलिए शिकारियों ने उसके मुँह के दोनो जबड़े अलग करने की कोशिश की और काफी बेदर्दी से उसे गले तक फाड़ दिया।
निबाड़ी खादर पर मिले ग्याप्रसाद ने बताया कि बुधबार को डाल्फिन सर्वे के लिए कानपुर को निकली विश्व प्रकृति निधि की टीम ने निबाड़ी खादर के पास बह रही एक सूँस (डाल्फिन का देहाती नाम) को अपनी नाव से बॉध लिया और उसके फोटो भी खींचे। बाद में उस डाल्फिन का कोई पता नही चला। ग्रामीण का अनुमान है कि डब्लूडब्लूएफ की टीम ने मरी हुई सूँस को आगे ले जाकर कहीं डिस्पोज कर दिया।
दरअसल, जब से बुलंदशहर से गुजर रही गंगा की धारा में डाल्फिन के संरक्षण के कार्यक्रम शुरू हुए है, जिला प्रशासन, पुलिस और वन विभाग की मुश्किलें काफी बढ़ गई है। सरकार चाहती है कि गंगा में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जलपरी का कुनबा बढ़ाया जाये। और इसीलिए विश्व प्रकृति निधि (भारत) को इसका जिम्मा सौंपा गया है। विश्व प्रकृति निधि ने गंगा के किनारे बसे इलाकों में डाल्फिन बचाने के लिए काफी जागरूकता कार्यक्रम चलाये है, लेकिन गंगा किनारे शिकारियों के कब्जे डब्लूडब्लूएफ आज तक नही हटा पाई। गढ़मुक्तेश्वर से नरौरा तक के गंगा इलाके को रामसर साइट घोषित किया गया और कानून के मुताबिक यहॉ शिकार पर रोक है। लेकिन आप कभी डाल्फिन दर्शन के बहाने इस इलाके में आइये..शिकारियों के गिरोह दिन-रात सक्रिय पायेंगे।
पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता का ही असर है कि डाल्फिन की तादात जिस तेजी से बढ़नी चाहिए थी, वो प्रगति देखने को नही मिली। लेकिन डाल्फिन बढ़ी हो या नही, डब्लूडब्लूएफ के फंड का जुगाड़ काफी बढ़ा है। निधि यहॉ देश-विदेश के सेलेब्रिट्रीज को ‘डाल्फिन बाच’ के बहाने लाती है और फायदा उठाती है। रामसर साइट में शिकार प्रभावी होने से उसे भी काफी मुसीबतें उठानी पड़ सकती है। उसके लिए खुले सरकारी खजाने मुँह पर ताला पड़ सकता है।
बात डाल्फिन की तादात की करें तो बाढ़ खत्म हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गया, लेकिन विश्व प्रकृति निधि के आंकड़ो में जलपरियों की संख्या स्थिर नही हो पा रही। गॉव वाले बताते है कि उन्होने बाढ़ के बाद डाल्फिन को गंगा से निकलने वाली नहरों और रजवाहों में देखा है। कुछ डाल्फिन तो डाउन स्ट्रीम में उतर गई जिनका रामसर साइट में लौटना असंभव है। जो बची-खुची है उनको शिकारियों की ऑखें नही छोड़ रही। विश्व प्रकृति निधि की ओर से नरौरा में केवल दो कर्मचारी रहते है और इन दोनो के जिम्मे ही डाल्फिन की सुरक्षा और उसके कुनबे को बढ़ाने की जिम्मेवारी है। निधि के अफसर तीज-त्यौहार में आने वाले मेहमानों की तरह आते है। सक्रियता की बात करें तो जिस डाल्फिन की लाश निबाडी खादर में दो दिन से पड़ी थी, गुरूवार को सूरज डूबने तक डब्लूडब्लूएफ उसे नही ढूँढ़ पाया। वनविभाग और पुलिस का भी हाल कुछ जुदा नही है। प्रशासनिक महकमों को डाल्फिन को बचाने की मुहिम में मछुआरों की मदद करिश्मा कर सकती है, लेकिन पीठ पीछे डब्लूडब्लूएफ के अफसर किसी भी ऊँच-नीच में उन्हें ही फँसाने के जुगाड़ करते रहते है। इसी वजह से हर कोई इस पचड़े से पल्ला झाड़ता नजर आता है।
डाल्फिन का स्वभाव बहुत हद तक इंसानों जैसा होता है। इसकी खूबसूरती और गंगा की धारा में इसकी तेजी देखने लायक होती है। शायद यही वजह है कि बुलंदशहर गंगा किनारे आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इसकी अठखेलियों का मोह नही छोड़ पाते। प्रदूषण से अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझती गंगा में डाल्फिन के अलावा अब शायद ही कुछ ऐसा हो, जिसे कोई देखना चाहे। डाल्फिन का संरक्षण इतना मुश्किल भी नही, बस जरूरत है विश्वास की जिसे सरकारें अवाम के दिलों में जगा सकें।
