कार के डेशबोर्ड पर चैनल का लॉगो लगा माइक रखा था। जिस गॉववाले से पूछते, वह उस माइक को देखता और मुस्कराकर आगे की ओर इशारा कर देता था। एक पक्की सड़क पर हमारा सफर खत्म हो गया। कार से उतरते ही गॉववालों ने घेर लिया। शर्माजी का घर पूछा तो साथ लग लिये..जैसे बाबले गॉव में ऊँट आ गया हो। लेकिन जिस खरंजे पर हम जा रहे थे उस पर पहले से ही सन्नाटा पसरा था। साथ चलते वक्त गॉववाले बता रहे थे कि पढ़ने-लिखने में होशियार एक लड़का कैसे पीर बन गया।
शर्माजी हमें देखते ही कुछ समझ गये। शायद उन्होने पीपली लाइव देख रखी थी। वो जिस खाट पर बैठे थे, उनके पास ही एक मटमैले रंग की लोही लपेटे बैठे उस नौजवान की उमर बीस एक साल रही होगी। मिट्टी लगी शर्ट के साथ शर्माजी ने तहमद लपेट ऱखा था। दोनो किरदार दिलचस्प थे। हमने हालचाल जाना और लगे हाथ दर्द टटोलने शुरू कर दिये।
लड़का ऐसे चुप था जैसे उसने ना बोलने की कसम खाई हो। ना चेहरे पर कोई भाव और ना ही ऑखों में कोई सपने। शर्माजी एक बार बोलना शुरू हुए तो रफ्तार ही पकड़ ली। “2 अक्टूबर को प्रदीप ने शरीर ढीला छोड़ दिया। झोलाछाप फेल हुए तो अलीगढ़ पहुँचे, लेकिन यहॉ के डॉक्टर लड़के की छाती पर आला रखने को भी राजी नही थे। शर्माजी के साले साहब दिल्ली सीबीआई में मुलाजिम है। मदद की दरकार लिये उनकी चौखट पर जा पहुँचे। उनके घर के बाहर दूसरे किनारे पर एक पीर की मजार है। गाड़ी रोककर दरवाजा खटखटाया, लेकिन तभी कार नाले में चली गई। बड़े लड़के ने निकालने की कोशिश की, 12-15 लोगो ने सहारा लगाया। लेकिन कार तो हिली ही नही। अचानक कई घंटों से मरणासन्न हालत में पड़े प्रदीप ने ड्राइविंग सीट सँभाली और कहा मैं निकालूगा। अगले ही पल गाड़ी स्टार्ट और बैक गियर लगाते ही कार नाले के बाहर। शर्माजी समझ गये कि चक्कर ऊपरी है।
साले साहब की सिफारिश पर एक अस्पताल में दो दिनों तक प्रदीप को बोतलें चढ़ती रही। डॉक्टर बोला- घर ले जाओ लौंडा एकदम ठीक है। फिर घर ले आये। लेकिन घर आते ही प्रदीप की फिर वही हालत। लेकिन अब उसका शरीर इठने लगा था। घर के सभी लोग मौजूद थे, तभी प्रदीप की आवाज भर्रायी। वह बोला मैं ले जाऊँगा इसे। बचा सको तो चैलेंज है। अचानक आवाज बदल गई। शरीर में फिर से ऐंठन हुई और अब प्रदीप पैर मोड़कर बैठ गया और आसमान की ओर देखकर दोनों हाथों से दुआ करने लगा। थोड़ी देर में उसने फिर से बोलना शुरू किया। प्रदीप की मॉ को बुलाया और बोला- ‘मॉग ले दुनियां की कोई भी चीज, आज खाली हाथ नही रहेगी। रूपया-पैसा जो भी चाहे। लेकिन तेरा लड़का नही बचेगा। इसे तो जाना है’ मॉ गिड़गिड़ाने लगी। बोली- ‘बाबा मुझे तो लड़का ही चाहिए और कुछ नही। बाबा बोल उठा, बहुत मुश्किल है, कोशिश करूँगा। कल सुबह तक मेरी मजार तैयार कराओ। अगले दिन मजार तैयार हो गई। बाबा फिर आये शाम को, बोले- कल सुबह साढ़े नौ बजे वो शैतान ले जायेगा तेरे बेटे को। मैं हामी तो नही भरता, लेकिन बचाने की कोशिश करूँगा। तीन दिन तक इसके शरीर को मेरी मजार पर रखे रहना और मेरा इंतजार करना।
वही हुआ जो बाबा ने कहा था। अगले दिन साढ़े नौ बजे प्रदीप की सांसे थम गई। हमने घर से ले जाकर उसके शरीर को मजार पर रख दिया और उसके ऊपर एक चादर ढक दी। घर में रोवा-पिट्टान पड़े थे। लेकिन हमें उम्मीद थी कि बाबा वादा पूरा करेगे। हजारों के झुक्कान झुके गये। सबकी ऑखें प्रदीप की तरफ देख रही थी। दोपहर बाद ढाई बजे के आसपास अचानक प्रदीप के चेहरे से चादर हट गई और उसके शरीर में हरकत होने लगी। देखते ही देखते वह उठ बैठा और मजार के नीचे बिस्तर लगाने का आदेश दिया। बिस्तर लगा तो प्रदीप ने टोपी मॉगी। भीड़ में मौजूद मौलवी साहब ने अपनी टोपी दे दी। उसके बाद चाकू माँगा और अपने कपड़े फाड़कर उतार दिये। हाथ में चाकू आते ही बाबा ने प्रदीप के शरीर को करीब सौ जगहों से गोद डाला। और वहॉ निकले खून को शरीर पर मल लिया। मुझसे बोले- तेरा लड़का बचा लिया है। अब मेरी सेवा करना। हर वृहस्पतिवार को गद्दी लगेगी। सो अब हर वृहस्पतिवार को गद्दी लगती है औऱ बाबा सबकी फरियाद सुनते है।
शर्माजी का बेटा प्रदीप अलीगढ़ के एक मेडीकल कॉलेज में बी-फार्मा की छात्र था। मैं हैरत में पड़ गया कि खांटी ब्राह्मण परिवार का मेडीकल स्टूडेंड लड़का फकीर कैसे बन सकता है और वह भी गैर मजहब का। लेकिन मेरे दिमाग में स्टोरी चल रही थी। इस कहानी को टीवी के लिए कैसे जाग्रत किया जाये। कैमरे खुल गये। बाबा की मजार की शूट शुरू हो गई। गॉववालों से हम बात करने लगे। प्रदीप भी मजार के एक तरफ मेंड़ पर आकर बैठ गया। अचानक मेरे साथी मुकुलजी को खुराफात सूझी। गॉववालों से बोले- हम बाबा का प्रचार करने आये है। हम स्टोरी टीवी पर चलाऐगें और फिर यहॉ डॉक्टर और रूह विज्ञान के विशेषज्ञ आकर बाबा पर रिसर्च करेगें। थोड़ी देर बाद मुकुलजी ने प्रदीप को ऑखों से इशारा किया कि मजार पर आकर एक शॉट दे दें। प्रदीप ने लोही उतारी और मजार पर आ गया। उसने दुआ को पोज बनाते हुए हमें शॉट देना शुरू किया। बामुश्किल 10 सैंकेड गुजरे होगे कि वह ऐंठने लगा। गॉववाले चीखने लगे—बाबा आ गये। अब सब पूछ लेना।
मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारों में मेरा अक्सर आना जाना रहता है। लेकिन मुझे कभी डर नही लगा। बाबा आ गये सुनते ही मेरे रौंगटे खड़े होने लगे। मुझे लगा कि अब बिना तैयारी के चमत्कार देखना होगा। मुझे मुकुलजी अब विलेन लग रहे थे। पता नही, क्या जरूरत थी बाबा को बुलाने की। इतना सोचते मैंने मजार की चाहरदीवारी छोड़ दी, लेकिन कैमरा ऑन रहा। शर्माजी हाथ में बिस्तर,गद्दी,चाकू और टोपी लेकर आ गये। दो लड़कों ने अगरबत्ती सुलगाकर उसका धुँआ बाबा के चारों ओर घुमाना शुरू किया। डर के मारे मेरा मन कर रहा था कि कैमरा बंद कर लूँ, कही बाबा नाराज हो गये तो...। लेकिन कैमरा चालू रहा। मुकुलजी तो बाबा के सामने जाकर ऐसे शूट कर रहे थे जैसे अब उनका चैनल बाबा को आठ दिन तक लगातार लाइव दिखाने वाला है। उनके चेहरे पर वहॉ बदले माहौल को लेकर किसी भी तरह का कोई रिएक्शन भी नही था। गद्दी पर विराजमान बाबा ने टोपी पहनी और जोर से बोले- बता क्यों बुलाया है मुझे, अल्लाह की बगैर मर्जी से आया हूँ। गिड़गिड़ाने के अंदाज में शर्माजी ने कुहनियों तक हाथ जोड़कर कहा- बाबा मीडियावाले आये है। बेटा के बारे में पूँछ रहे थे। ‘क्या पूँछ रहे थे बताओ, क्या कैमरे में कैद करना चाहते हो। लगता है मुझ पर शक कर रहे हो। लो करो कैद मुझे कैमरे में। अब दिखाऊँगा तुम्हे अल्लाह के निशान। इतना कहते है बाबा ने अपनी शर्ट को दोनो हाथों से खींचा। मेरी डर के मारे घिग्गी बँध गई, मैने सोचा किसी तरह मुसीबत में से निकलूँ, कहा- बाबा..हम आपको कैमरे में कैद नही करना चाहते, बस आपके दर्शन करने थे, सो कर लिये अब आप शांत हो जाओ। कहते ही मैंने कैमरा ऑफ कर लिया। मुझे उम्मीद थी कि मुकुलजी भी य़ही कहेगे, लेकिन उनका कैमरा चलता रहा और वह चुप रहे। बाबा ने बनियान भी उतार दी और हाथ फैलाकर बोले, चाकू लाओ। हाथ में चाकू आते ही बाबा ने बाजुओ और सीने पर ऐसे काटना शुरू किया जैसे मौसमी के छिलके उतारते वक्त कट लगाये जाते है। मुझे लगा कि बाबा मजाक के मूड में है, लेकिन कुछ सैकेंड बीतने पर बाबा ने जहॉ-जहॉ मार्क किये थे, वहॉ खून निकलना शुरू हो गया। बाबा बोले- और दिखाऊँ। शर्माजी ने हाथ जोड़कर कहा, बाबा मान जाओ, अब रहने दो।
अब बाबा ने फरियादें सुननी शुरू की। एक नौजवान आगे पहुँचा और नौकरी के लिए फरियाद करने लगा। बाबा ने उसे एक साल का वक्त देकर कहा कि गद्दी पर आते रहना। फिर चीखकर बोले- हैं और कोई कुछ पूँछना चाहता है। मैंने देखा मुकुलजी कैमरा एक गॉववाले को पकड़ाकर बाबा के सामने पहुँच गये और हाथ दिखाते हुए बोले- बाबा मैं बहुत परेशान हूँ। बाबा बोले- तुझे कोई परेशानी नही। नही बाबा मेरे जीवन में बहुत दुख है। मुकुलजी ने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना बाबा को कह सुनाया। बाबा आसमान टापने लगे। फिर बोले- गद्दी पर आना।
मुकुलजी उठ आये और फिर से कैमरा चलाना शुरू कर दिया। बाबा चले गये और प्रदीप के जिस्म में ऐंठन शुरू हो गई। थोड़ी देर में प्रदीप बेहोश था और उसके परिजन उसे घर की ओर ले जा रहे थे। मैंने मुकुलजी से कहा-चलो जल्दी निकलो। कहॉ फांस दिया। कान में बोले- बड़ी स्टोरी है टीआरपी जमकर मिलेगी। शर्माजी से गद्दी पर आने का वादा करके मुकुलजी कार में बैठे तो मैंने झींकना शुरू कर दिया- क्या जरूरत थी मजार पर पोज बनबाने की, गद्दी वाले दिन कर लेते। मुकुलजी बोले- बाबा डॉक्टरों के आने की बात सुनकर डर गया। लेकिन यार उसकी नौटंकी के आगे हमारी स्टोरी कुछ भी नही। इसकी पीपली लाइव असली है, लेकिन बाबा फ्रॉड है। मेरे दिमाग में सवालों के अंबार लग गये। सोचने पर मुझे भी लगा...चमत्कार कहॉ है, बस एक डर था और ऐसे डर देहातियों तो फांसने के लिए काफी होते है।
