Wednesday, April 14, 2010

शहादत की खैरात पर अब लगेगा ताला


देश के लिए कुर्बानी का मतलब किसी भी वरदान से बहुत बड़ा होता है। ये बिडम्बना ही है कि इस देश में शहादत के बाद शहीदों के परिवारों को सम्मान और मदद के लिए सरकार के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहना पड़ता है। लेकिन ना तो सरकार और ना ही समाज, कोई भी शहीदों के आश्रितों की मदद के लिए आगे नही आता। ये कहानी देशसेवा में अपने प्राणों का बलिदान देने वाली पायलट शेफाली चौधरी की है। शेफाली की शहादत के बाद उसकी मॉ को सरकार से पैंशन के नाम पर पन्द्रह सौ रूपये महीने की खैरात मिलती है। लेकिन इस साल शेफाली की नौकरी का कमीशन्ड पीरियड खत्म होते ही इस खैरात पर ताला लग जायेगा। बुलंदशहर की शेफाली चौधरी हिन्दुस्तान की पहली एअरकाप्टर महिला पायलट थी।
       
उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुकी 67 साल सुशीला चौधरी की जिंदगी अब चंद यादों के सहारे ही बाकी है। बुलंदशहर की सुशीला चौधरी ऐसी वीर बेटी की मॉ है, जिसने महज 22 साल की छोटी सी उम्र में बड़ी शहादत देकर इस मॉ की कोख को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कर दिया। शेफाली चौधरी इंडियन एअरफोर्स की पहली एअरकाप्टर महिला पायलट थी। 24 मार्च 1996 को असोम में तैनाती के वक्त शेफाली ने नदी में डूबते 2 लोगों की जान बचाई लेकिन खुद सेवा की बेदी पर कुर्बान हो गई। शेफाली नही रही। पिछले 13 सालों से भारत सरकार उनकी मॉ को शेफाली की शहादत की पैंशन के नाम पर पन्द्रह सौ रूपये महीने की खैरात देती है। लेकिन इस साल शेफाली की नौकरी का 14 साल का कमीशन पीरियड खत्म होते ही सरकारी खैरात का एकाउन्ट हमेशा के लिए बंद हो जायेगा। 
     सुशीलाचौधरी कहती है कि देश के लिए जान देने वालों के प्रति सरकार अगर ऐसा बेरूखा रवैया रखेगी तो भला कौन नौजवान देश के लिए सोचेगा। यहॉ सुप्रीम कोर्ट की पिछले दिनों आई वह टिप्पणी को नजीर कहा जा सकता है जिसमें अदालत ने सरकार से ऐसे सैनिकों और उनके आश्रितों के प्रति अच्छा व्यवहार करने की सलाह दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार सैनिकों को भिखारी ना समझे। हॉलाकि शहादत के बाद शेफाली को सरकार ने सर्वोच्च जीवन रक्षा पदक से सम्मानित तो किया, लेकिन शेफाली की कुर्बानी को भारत सरकार शहादत नही मानती। सरकार मानती है कि शेफाली सेवा में तैनाती पर तो थी लेकिन जिस वीरता में उसकी जान गई वह सरकार का कोई अभियान नही था।
      
शेफाली की शहादत पर केन्द्र सरकार से ज्यादा बेरूखी बुलंदशहर जिला प्रशासन ने की है। 2001 में जिला योजना से 2 लाख रूपये जारी कर जिला प्रशासन ने शेफाली की याद में उसके पैतृक गॉव लौदाना में एक स्मृतिद्वार बनाने का काम शुरू किया। लेकिन काम अधूरा छोड़कर सुलभ इंटरनेशनल नाम का कार्यदायी एनजीओ पूरा पैसा डकार गया। काम ठप्प होने के बाद शेफाली के माता-पिता ने जिला प्रशासन के अफसरों की चौखट पर सैकड़ों बार चक्कर काटे लेकिन अफसर काम पूरा कराना तो दूर, उस संस्था का पता तक नही खोज पाये। शेफाली की यादें जिन्दा रहने के लिए आज भी सरकार की हमदर्दी की मुन्तजिर है। शेफाली के पिता की मौत के बाद जिलाधिकारी की चौखट पर सैकड़ों बार इस बूढ़ी मॉ ने अरजी लगाई, तब से एक दर्जन से ज्यादा जिलाधिकारी बदल गये लेकिन किसी भी अफसर की सोच में तब्दीली नही आई। सुशीला चौधरी बताती है कि समझदार होने के बाद उन्होने कभी शेफाली को रोते हुए या दुखी नही देखा। मॉ की ये यादें उस वीर बेटी के साहस को सलाम है जिसके चलते शेफाली गॉव की ऊबड़-खाबड़ कच्ची गलियों से आसमान की बुलंदियां तक का सफर तय कर पाई। उसने उस जज्बे को भी सच किया जिसकी शपथ उसने अपनी एअरफोर्स ज्वाइन करते वक्त ली थी। सेवा और देशभक्ति का जज्बा...। अब सरकार भले ही शेफाली की शहादत को इत्तेफाकन मौत माने, लेकिन ये सवाल हमेशा दिल को कचोटता है कि देश के लिए मर मिटने वालों के साथ सरकार की ऐसी बेरूखी के चलते भला कौन-मॉ अपनी बेटी को शेफाली बनाना चाहेगी।

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